Beginning
9 तब परमेश्वर ने नगर को दण्ड देने के लिये उत्तरदायी प्रमुखों को जोर से पुकारा। हर एक प्रमुख के हाथ में उसका अपना विध्वंसक शस्त्र था। 2 तब मैंने ऊपरी द्वार से छ: व्यक्तियों को सड़क पर आते देखा। यह द्वार उत्तर की ओर है। हर एक व्यक्ति अपने घातक शस्त्र को अपने हाथ में लिये था। उन व्यक्तियों में से एक ने सूती वस्त्र पहन रखा था। उसके पास कमर में लिपिक की एक कलम और स्याही थी। वे लोग मन्दिर से काँसे की वेदी के पास गए और वहाँ खड़े हुए। 3 तब इस्राएल के परमेश्वर का तेज करुब (स्वर्गदूतों) के ऊपर से, जहाँ वह था, उठा। तब वह तेज मन्दिर के द्वार पर गया। जब वह डयोढ़ी पर पहुँचा तो वह रूक गया। तब उस तेज ने उस व्यक्ति को बुलाया जो सूती वस्त्र, कलम और स्याही धारण किये हुए था।
4 तब यहोवा ने उससे कहा, “यरूशलेम नगर से होकर निकलो। जो लोग उस नगर में लोगों द्वारा की गई भयंकर चीजों के विषय में दुःखी हैं और घबरायें हुए हैं, उन हर एक के ललाट पर एक चिन्ह अंकित करो।”
5-6 तब मैंने परमेश्वर को अन्य लोगों से कहते सुना, “मैं चाहता हूँ कि तुम लोग प्रथम व्यक्ति का अनुसरण करो। तुन उन सभी व्यक्तियों को मार डालो। जिनके ललाट पर चिन्ह नहीं है। तुम इस पर ध्यान नहीं देना कि वे अग्रज (प्रमुख) युवक, युवतियाँ, बच्चे, या मातायें हैं। तुम्हें अपने शस्त्रों का उपयोग करना है, उन हर एक को मार डालना है जिनके ललाट पर चिन्ह नहीं है। कोई दया न दिखाओ। किसी व्यक्ति के लिये अफसोस न करो। यहाँ मेरे मन्दिर से आरम्भ करो।” इसलिये उन्होंने मन्दिर के सामने के अग्रजों (प्रमुखों) से आरम्भ किया।
7 परमेश्वर ने उनसे कहा, “इस स्थान को अपवित्र बना दो! इस आंगन को शवों से भर दो!” इसलिये वे गए और उन्होंने नगर में लोगों को मार डाला।
8 जब वे लोग, लोगों को मारने गए, तो मैं वहीं रूका रहा। मैंने भूमि पर अपना माथा टेकते हुए कहा, “हे मेरे स्वामी यहोवा, यरूशलेम के विरुद्ध अपना क्रोध प्रकट करने के लिये, क्या तू इस्राएल में बचे हुये सभी लोगों को मार रहा है”
9 परमेश्वर ने कहा, “इस्राएल और यहूदा के परिवार ने अत्याधिक बुरे पाप किये हैं। इस देश में सर्वत्र लोगों की हत्यायें हो रही हैं और यह नगर अपराध से भरा पड़ा है। क्यों क्योंकि लोग स्वयं कहते हैं, ‘यहोवा ने इस देश को छोड़ दिया। वे उन कामों को नहीं देख सकता जिन्हें हम कर रहे हैं।’ 10 और मैं दया नहीं दिखाऊँगा। मैं उन लोगों के लिये अफसोस अनुभव नहीं करूँगा। उन्होंने स्वयं इसे बुलाया है, मैं इन लोगों को केवल दण्ड दे रहा हूँ जिसके ये पात्र हैं!”
11 तब सूती वस्त्र, लिपिक की कलम और स्याही धारण करने वाला व्यक्ति बोला। उसने कहा, “मैंने वह कर दिया जो तेरा आदेश था।”
10 तब मैंने उस कटोरे को देखा जो करुब (स्वर्गदूत) के सिरों के ऊपर था। कटोरा नीलमणि की तरह स्वच्छ नीला दिख रहा था। वहाँ कटोरे के ऊपर कुछ सिंहासन की तरह दिख रहा था। 2 तब उस व्यक्ति ने जो सिंहासन पर बैठा था, सन के वस्त्र पहने हुए व्यक्ति से कहा, “तुफानी—बादल में आओ। करुब (स्वर्गदूत) के क्षेत्र में आओ। करुब (स्वर्गदूतों) के बीच से कुछ अंगारे अपने हाथ में लो। अपने हाथ में उन कोयलों को ले जाओ और जाकर उन्हें यरूशलेम नगर पर फेंक दो।”
वह व्यक्ति मेरे पीछे चला। 3 करुब (स्वर्गदूत) उस समय मन्दिर के दक्षिण के क्षेत्र में खड़े थे, जब वह व्यक्ति बादल में घुसा। बादल भीतरी आँगन में भर गया। 4 तब यहोवा का तेज करुब (स्वर्गदूत) से अलग होकर मन्दिर के द्वार पर चला गया। तब बादल मन्दिर में भर गया और यहोवा के तेज की प्रखर ज्योति पूरे आँगन में भर गई। 5 तब मैंने करूब (स्वर्गदूतों) के पंखों की फड़फड़ाहट पूरे बाहरी आँगन में सुनी जा सकती थी। बाहरी आँगन में फड़फड़ाहट बड़ी प्रचण्ड थी, वैसी ही जैसी सर्वशक्तिमान परमेश्वर की गरजती वाणी होती है, जब वह बातें करता है।
6 परमेश्वर ने सन के वस्त्र पहने हुए व्यक्ति को आदेश दिया था। परमेश्वर ने उसे “तूफानी—बादल” में घुसने के लिये कहा और करुब (स्वर्गदूतों) के बीच से कुछ अंगारे लेने को कहा। इसलिये वह व्यक्ति तूफानी—बादल में घुस गया और गोल चक्रों में से एक के सहारे खड़ा हो गया। 7 करुब (स्वर्गदूतों) में से एक ने अपना हाथ बढ़ाया और करुब (स्वर्गदूतों) के क्षेत्र के बीच से कुछ अंगारे लिये। उसने अंगारों को उस व्यक्ति के हाथों में रख दिया और वह व्यक्ति वहाँ से चला गया। 8 (करुब स्वर्गदूतों के पंखों के नीचे कुछ ऐसा था जो मनुष्य की भुजाओं की तरह दिखता था।)
9 तब मैंने देखा कि वहाँ चार गोल चक्र थे। हर एक करुब (स्वर्गदूत) की बगल में एक चक्र था, और चक्र स्वच्छ पीले रत्न की तरह दिखते थे। 10 वे चार चक्र थे और सब चक्र एक से प्रतीत होते थे। वे ऐसे दिखते थे मानों एक चक्र दूसरे चक्र में हो। 11 जब वे चलते थे तो किसी भी दिशा में जा सकते थे। जब कभी वे चलते थे वे चारों एक साथ चलते थे। किन्तु उनके चलने के साथ करुब (स्वर्गदूत) साथ—साथ चक्कर नहीं लगाते थे। वे उस दिशा में चलते थे, जिधर उनका मुख होता था। जब वे चलते थे तो वे इधर—उधर नहीं मुड़ते थे। 12 उनके पूरे शरीर पर आँखे थीं। उनकी पीठ, उनकी भुजा, उनके पंख और उनके चक्र में आँखे थीं। हाँ, चारों चक्रों में आँखे थीं! 13 मेरे सुनते हुए इन पहियों को चक्कर कहा गया, अर्थात् घुमने वाले पहिए।
14-15 हर एक करुब (स्वर्गदूत) चार मुखों वाला था। पहला मुख करुब का था। दूसरा मुख मनुष्य का था। तीसरा सिंह का मुख था और चौथा उकाब का मुख था। तब मैंने जाना कि (ये करुब स्वर्गदूत वे जानवर थे जिन्हें मैंने कबार नदी के दर्शन में देखा था!)
तब करुब (स्वर्गदूत) हवा में उठे। 16 उनके साथ चक्र उठे। चक्रों ने अपनी दिशा उस समय नहीं बदली जब करुब (स्वर्गदूत) ने पंख खोले और वे हवा में उड़े। 17 यदि करुब (स्वर्गदूत) हवा में उड़ते थे तो चक्र उनके साथ जाते थे। यदि करुब (स्वर्गदूत) शान्त खड़े रहते थे तो चक्र भी वैसा ही करते थे। क्यों क्योंकि उनमें प्राणियों की आत्मा की शक्ति थी।
18 तब यहोवा का तेज मन्दिर की देहली से उठा, करुब (स्वर्गदूतों) के स्थान के ऊपर गया और वहाँ ठहर गया। 19 तब करुब (स्वर्गदूतों) ने अपने पंख खोले और हवा में उड़ गए। मैंने उन्हें मन्दिर को छोड़ते देखा! चक्र उनके साथ चले। तब वे यहोवा के मन्दिर के पूर्वी द्वार पर ठहरे। इस्राएल के परमेश्वर का तेज हवा में उनके ऊपर था।
20 तब मैंने इस्राएल के परमेश्वर के तेज के नीचे प्राणियों को कबार नदी के दर्शन में याद किया और मैंने अनुभव किया कि वे प्राणी करुब (स्वर्गदूत) थे। 21 हर एक प्राणी के चार मुख थे, चार पंख थे और पंखों के नीचे कुछ ऐसा था जो मनुष्य की भुजाओं की तरह दिखता था। 22 करुब (स्वर्गदूतों) के वही चार मुख थे जो कबार नदी के दर्शन के प्राणियों के थे और वे सीधे आगे उस दिशा में देखते थे, जिधर वे जा रहे थे।
11 तब आत्मा मुझे यहोवा के मन्दिर के पूर्वी द्वार पर ले गया। इस द्वार का मुख पूर्व को है जहाँ सूरज निकलता है। मैंने इस फाटक के प्रवेश द्वार पर पच्चीस व्यक्ति देखे। अज्जूर का पुत्र याजन्याह उन लोगों के साथ था और बनायाह का पुत्र पलत्याह वहाँ था। पलत्याह लोगों का प्रमुख था।
2 तब परमेश्वर ने मुझसे कहा। उसने बताया, “मनुष्य के पुत्र, ये वे व्यक्ति हैं जो इस नगर में बुरी योजना बनाते हैं। ये सदा लोगों के बुरे काम करने को कहते हैं। 3 वे लोग कहते हैं, ‘हम लोग शीघ्र ही फिर से अपने मकान बनाने लगेंगे। हम लोग पात्र में रखे माँस की तरह इस नगर में सुरक्षित हैं!’ 4 वे यह झूठ फैला रहे हैं। इसलिये तुम्हें मेरे लिये लोगों से बात करनी चाहिए। मनुष्य के पुत्र! जाओ और लोगों के बीच भविष्यवाणी करो।”
5 तब यहोवा की आत्मा मुझमें आई। उसने मुझसे कहा, “उनसे कहो कि यहोवा ने यह सब कहा है: इस्राएल के परिवार, तुम बड़ी योजना बना रहे हो। किन्तु मैं जानता हूँ कि तुम क्या सोच रहे हो! 6 तुमने इस नगर में बहुत से लोगों को मार डाला है। तुमने सड़कों को शवों से पाट दिया है। 7 अब हमारा स्वामी यहोवा, यह कहता है, ‘वे शव माँस हैं और यह नगर पात्र है। किन्तु वह (नबूकदनेस्सर) आएगा और तुम्हें इस सुरक्षित पात्र से निकाल ले जाएगा! 8 तुम तलवार से भयभीत हो। किन्तु मैं तुम्हारे विरुद्ध तलवार ला रहा हूँ।’” हमारे स्वामी यहोवा ने यह सब कहा है। इसलिये ये घटित होंगी!
9 परमेश्वर ने यह भी कहा, “मैं तुम लोगों को इस नगर से बाहर ले जाऊँगा और मैं तुम्हें अजनबियों को सौंप दूँगा। मैं तुम लोगों को दण्ड दूँगा! 10 तुम तलवार के घाट उतरोगे। मैं तुम्हें यहाँ इस्राएल में दण्ड दूँगा जिससे तुम समझोगे कि वह मैं हूँ जो तुम्हें दण्ड दे रहा हूँ। मैं यहोवा हूँ। 11 हाँ, यह स्थान खौलती कड़ाही बनेगा और तुम इसमें के माँस होंगे, जो भूना जाता है! मैं तुम्हें यहाँ इस्राएल में दण्ड दूँगा। 12 तब तुम जानोगे कि मैं यहोवा हूँ। वह मेरा नियम था जिसे तुमने तोड़ा है! तुमने मेरे आदेशों का पालन नहीं किया। तुमने अपने चारों ओर के राष्ट्रों की तरह रहने का निर्णय किया।”
13 जैसे ही मैंने परमेश्वर के लिये बोलना समाप्त किया, बनायाह का पुत्र पलत्याह मर गया! मैं धरती पर गिर पड़ा। मैंने धरती पर माथा टेका और कहा, “हे मेरे स्वामी यहोवा, तू क्या इस्राएल के सभी बचे हुओं को पूरी तरह नष्ट करने पर तुला हुआ है!”
14 किन्तु तब यहोवा का वचन मुझे मिला। उसने कहा, 15 “मनुष्य के पुत्र, तुम इस्राएल के परिवार के अपने उन भाईयों को याद करो जिन्हें अपने देश को छोड़ने के लिये विवश किया गया था। लेकिन मैं उन्हें वापस लाऊँगा। किन्तु यहाँ यरूशलेम में रहने वाले लोग कह रहे है, यहोवा हम से दूर रह। यह भूमि हमें दी गई—यह हमारी है!”
16 इसलिये उन लोगों से यह सब कहो: हमारा स्वामी यहोवा, कहता है, “यह सत्य है कि मैंने अपने लोगों को बहुत दूर के देशों में जाने को विवश किया। मैंने ही उनको बहुत से देशों में बिखेरा और मैं अन्य देशों में उन के लिये थोड़े समय का पवित्र स्थान ठहरुँगा। 17 इसलिये तुम्हें उन लोगों के कहना चाहिए कि उनका स्वामी यहोवा, उन्हें वापस लाएगा। मैंने तुम्हें, बहुत से देशों में बिखेर दिया है। किन्तु मैं तुम लोगों को एक साथ इकट्ठा करुँगा और उन राष्ट्रों से तुम्हें वापस लाऊँगा। मैं इस्राएल का प्रदेश तुम्हें वापस दूँगा 18 और जब हमारे लोग लौटेंगे तो वे उन सभी भंयकर गन्दी देवमूर्तियों को, जो अब यहाँ है, नष्ट कर देंगे। 19 मैं उन्हें एक साथ लाऊँगा और उन्हें एक व्यक्ति सा बनाऊँगा। मैं उनमें नयी आत्मा भरूँगा। मैं उनके पत्थर के हृदय को दूर करुँगा और उसके स्थान पर सच्चा हृदय दूँगा। 20 तब वे मेरे नियमों का पालन करेंगे। वे मेरे आदेशों का पालन करेंगे, वे वह कार्य करेंगे जिन्हें मैं करने को कहूँगा। वे सचमुच मेरे लोग होंगे और मैं उनका परमेश्वर होऊँगा।”
21 तब परमेश्वर ने कहा, “किन्तु इस समय उनका हृदय भयंकर गन्दी देवमूर्तियों का हो चुका है। मुझे उन लोगों को उन बुरे कर्मों के लिये दण्ड देना चाहिए जो उन्होंने किया है।” मेरे स्वामी यहोवा ने यह कहा है। 22 तब करुब (स्वर्गदूत) ने अपने पंख खोले और हवा में उड़ गये। चक्र उनके साथ गए। इस्राएल के परमेश्वर का तेज उनके ऊपर था। 23 यहोवा का तेज ऊपर हवा में उठा और उसने यरूशलेम को छोड़ दिया। वह क्षण भर के लिये यरूशलेम के पूर्व की पहाड़ी पर ठहरा। 24 तब आत्मा ने मुझे हवा में उठाया और वापस बाबुल में पहुँचा दिया। उसने मुझे उन लोगों के पास लौटाया, जो इस्राएल छोड़ने के लिये विवश किये गये थे। तब दर्शन में परमेश्वर की आत्मा हवा में उठी और मुझे छोड़ दिया। मैंने उन सभी चीजों को परमेश्वर के दर्शन में देखा। 25 तब मैंने निर्वासित लोगों से बातें की। मैंने वे सभी बातें बताई जो यहोवा ने मुझे दिखाई थीं।
12 तब यहोवा का वचन मुझे मिला। उसने कहा, 2 “मनुष्य के पुत्र, तुम विद्रोही लोगों के साथ रहते हो। वे सदैव मेरे विरुद्ध गये हैं। देखने के लिये उनकी आँखें हैं जो कुछ मैंने उनके लिये किया है। किन्तु वे उन चीजों को नहीं देखते। सुनने के लिये उनके कान हैं, उन चीजों को जो मैंने उन्हें करने को कहा है। किन्तु वे मेरे आदेश नहीं सुनते। क्यों क्योंकि वे विद्रोही लोग हैं। 3 इसलिए, मनुष्य के पुत्र अपना सामान बांध लो। ऐसा व्यवहार करो मानों तुम किसी दूर देश को जा रहे हो। यह इस प्रकार करो कि लोग तुम्हें देखते रहें। संभव है, कि वे लोग तुम पर ध्यान दें, किन्तु वे लोग बड़े विद्रोही लोग हैं।
4 “दिन के समय तुम अपना सामान इस प्रकार बाहर ले जाओ कि लोग तुम्हें देखते रहें। तब शाम को ऐसा दिखावा करो, कि तुम दूर देश में एक बन्दी की तरह जा रहे हो। 5 लोगों की आँखों के सामने दीवार में एक छेद बनाओ और उस दीवार के छेद से बाहर जाओ। 6 रात को अपना सामान कन्धे पर रखो और उस स्थान को छोड़ दो। अपने मुँह को ढक लो जिससे तुम यह न देख सको कि तुम कहाँ जा रहे हो। इन कामों को तुम्हें इस प्रकार करना चाहिये, कि लोग तुम्हें देख सकें। क्यों क्योंकि मैं तुम्हें इस्राएल के परिवार के लिये एक उदाहरण के रूप में उपयोग कर रहा हूँ।”
7 इसलिये मैंने (यहेजकेल ने) आदेश के अनुसार किया। दिन के समय मैंने अपना सामान उठाया और ऐसा दिखावा किया मानों मैं किसी दूर देश को जा रहा हूँ। उस शाम मैंने अपने हाथों का उपयोग किया और दीवार में एक छेद बनाया। रात को मैंने अपना सामान कन्धे पर रखा और चल पड़ा। मैंने यह सब इस प्रकार किया कि सभी लोग मुझे देख सकें।
8 अगली सुबह मुझे यहोवा का वचन मिला। उसने कहा, 9 “मनुष्य के पुत्र, क्या इस्राएल के उन विद्रोही लोगों ने तुमसे पूछा कि तुम क्या कर रहे हो 10 उनसे कहो कि उनके स्वामी यहोवा ने ये बातें बताई है। यह दुःखद वचन यरूशलेम के प्रमुखों और वहाँ रहने वाले इस्राएल के सभी लोगों के बारे में है। 11 उनसे कहो, ‘मैं (यहेजकेल) तुम सभी लोगों के लिये एक उदाहरण हूँ। जो कुछ मैंने किया है वह तुम लोगों के लिये सत्य होगा।’ तुम सचमुच बन्दी के रूप में दूर देश में जाने के लिये विवश किये जाओगे। 12 तुम्हारा प्रमुख दीवार में छेद करेगा और रात को गुप्त रूप से निकल भागेगा। वह अपने मुख को ढक लेगा जिससे लोग उसे पहचानेंगे नहीं। उसकी आँखे, यह देखने के लायक नहीं होंगी कि वह कहाँ जा रहा है। 13 वह भाग निकलने का प्रयत्न करेगा। किन्तु मैं (परमेश्वर) उसे पकड़ लूँगा! वह मेरे जाल में फँस जाएगा और मैं उसे बाबुल लाऊँगा जो कसदियों के लोगों का देश है। किन्तु वह देख नहीं पाएगा कि वह कहाँ जा रहा है। शत्रु उसकी आँखे निकाल लेगा और उसे अन्धा कर देगा। 14 मैं राजा के लोगों को विवश करुँगा कि वे इस्राएल के चारों ओर विदेशों में रहें। मैं उसकी सेना को तितर—बितर कर दूँगा और शत्रु के सैनिक उनका पीछा करेंगे। 15 तब वे लोग समझेंगे कि मैं यहोवा हूँ। वे समझेंगे कि मैंने उन्हें राष्ट्रों में बिखेरा। वे समझ जाएंगे कि मैंने उन्हें अन्य देशों में जाने के लिये विवश किया।
16 “किन्तु मैं कुछ लोगों को जीवित रखूँगा। वे रोग, भूख और युद्ध से नहीं मरेंगे। मैं उन लोगों को इसलिए जीवित रहने दूँगा, कि वे अन्य लोगों से उन भयंकर कामों के बारे में कह सकेंगे, जो उन्होंने मेरे विरुद्ध किये। तब वे जानेंगे कि मैं यहोवा हूँ।”
17 तब यहोवा का वचन मेरे पास आया। उसने कहा, 18 “मनुष्य के पुत्र! तुम्हें ऐसा करना चाहिये मानों तुम बहुत भयभीत हो। जब तुम खाना खाओ तब तुम्हें काँपना चाहिए। तुम्हें पानी पीते समय चिन्तित और भयभीत होने का दिखावा करना चाहिये। 19 तुम्हें यह साधारण जनता से कहना चाहिये। तुम्हें कहना चाहिये, ‘हमारा स्वामी यहोवा यरूशलेम के निवासियों और इस्राएल के अन्य भागों के लोगों से यह कहता है। लोगों, तुम भोजन करते समय बहुत परेशान होगे। तुम पानी पीते समय भयभीत होगे। क्यों क्योंकि तुम्हारे देश में सभी कुछ नष्ट हो जाएगा। वहाँ रहने वाले सभी लोगों के प्रति शत्रु बहुत क्रूर होगा। 20 तुम्हारे नगरों में इस समय बहुत लोग रहते हैं, किन्तु वे नगर नष्ट हो जाएंगे। तुम्हारा पूरा देश नष्ट हो जाएगा। तब तुम समझोगे कि मैं यहोवा हूँ।’”
21 तब यहोवा का वचन मुझे मिला। उसने कहा, 22 “मनुष्य के पुत्र, इस्राएल के प्रदेश के बारे में लोग यह कहावत क्यों सुनाते हैं:
‘विपत्ति शीघ्र न आएगी,
दर्शन कभी न होंगे?’
23 “उन लोगों से कहो कि तुम्हारा स्वामी यहोवा तुम्हारी इस कहावत का पढ़ना बन्द कर देगा। वे इस्राएल के बारे में वे बातें कभी भी नहीं कहेंगे। अब वे यह कहावत सुनाएंगे:
‘विपत्ति शीघ्र आएगी।
दर्शन घटित होंगे।’
24 “यह सत्य है कि इस्राएल मे कभी भी झूठे दर्शन घटित नहीं होंगे। अब ऐसे जादूगर भविष्य में नहीं होंगे जो ऐसी भविष्यवाणी करेंगे जो सच्ची नहीं होगी। 25 क्यों क्योंकि मैं यहोवा हूँ। मैं वही कहूँगा, जो मैं कहना चाहूँगा और वह चीज घटित होगी और मैं घटना—काल को लम्बा खींचने नहीं दूँगा। वे विपत्तियाँ शीघ्र आ रही हैं। तुम्हारे अपने जीवनकाल में ही। विद्रोही लोगों! जब मैं कुछ कहता हूँ तो मैं उसे घटित करता हूँ।” मेरे स्वामी यहोवा ने उन बातों को कहा।
26 तब यहोवा का वचन मुझे मिल। उसने कहा, 27 “मनुष्य के पुत्र, इस्राएल के लोग समझते हैं कि जो दर्शन मैं तुझे देता हूँ, वे बहुत दूर के भविष्य में घटित होंगे। वे समझते हैं, कि जिन विपत्तियों के बारे में तुम बातें करते हो, वे आज से वहुत वर्षों बाद घटित होंगी। 28 अत: तुम्हें उनसे यह कहना चाहिये, ‘मेरा स्वामी यहोवा कहता है: मैं और अधिक विलम्ब नहीं कर सकता। यदि मैं कहता हूँ, कि कुछ घटित होगा तो वह घटित होगा।’” मेरे स्वामी यहोवा ने उन बातों को कहा।
© 1995, 2010 Bible League International