Beginning
37 जब तक स्वयं यहोवा ही किसी बात के होने की आज्ञा नहीं देता,
तब तक ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है कि कोई बात कहे और उसे पूरा करवा ले।
38 बुरी—भली बातें सभी परम प्रधान परमेश्वर के मुख से ही आती हैं।
39 कोई जीवित व्यक्ति शिकायत कर नहीं सकता
जब यहोवा उस ही के पापों का दण्ड उसे देता है।
40 आओ, हम अपने कर्मो को परखें और देखँ,
फिर यहोवा के शरण में लौट आयें।
41 आओ, स्वर्ग के परमेश्वर के लिये हम हाथ उठायें
और अपना मन ऊँचा करें।
42 आओ, हम उससे कहें, “हमने पाप किये हैं और हम जिद्दी बने रहे,
और इसलिये तूने हमको क्षमा नहीं किया।
43 तूने क्रोध से अपने को ढांप लिया,
हमारा पीछा तू करता रहा है,
तूने हमें निर्दयतापूर्वक मार दिया!
44 तूने अपने को बादल से ढांप लिया।
तूने ऐसा इसलिये किया था कि कोई भी विनती तुझ तक पहुँचे ही नहीं।
45 तूने हमको दूसरे देशों के लिये ऐसा बनाया
जैसा कूड़ा कर्कट हुआ करता हैं।
46 हमारे सभी शत्रु
हमसे क्रोध भरे बोलते हैं।
47 हम भयभीत हुए हैं हम गर्त में गिर गये हैं।
हम बुरी तरह क्षतिग्रस्त है! हम टूट चुके हैं!”
48 मेरी आँखों से आँसुओं की नदियाँ बही!
मैं विलाप करता हूँ क्योंकि मेरे लोगों का विनाश हुआ है!
49 मेरे नयन बिना रूके बहते रहेंगे!
मैं सदा विलाप करता रहूँगा!
50 हे यहोवा, मैं तब तक विलाप करता रहूँगा
जब तक तू दृष्टि न करे और हम को देखे!
मैं तब तक विलाप ही करता रहूँगा
जब तक तू स्वर्ग से हम पर दृष्टि न करे!
51 जब मैं देखा करता हूँ जो कुछ मेरी नगरी की युवतियों के साथ घटा
तब मेरे नयन मुझको दु:खी करते हैं।
52 जो लोग व्यर्थ में ही मेरे शत्रु बने है,
वे घूमते हैं मेरी शिकार की फिराक में, मानों मैं कोई चिड़िया हूँ।
53 जीते जी उन्होंने मुझको घड़े में फेंका
और मुझ पर पत्थर लुढ़काए थे।
54 मेरे सिर पर से पानी गुज़र गया था।
मैंने मन में कहाँ, “मेरा नाश हुआ।”
55 हे यहोवा, मैंने तेरा नाम पुकारा।
उस गर्त के तल से मैंने तेरा नाम पुकारा।
56 तूने मेरी आवाज़ को सुना।
तूने कान नहीं मूंद लिये।
तूने बचाने से और मेरी रक्षा करने से नकारा नहीं।
57 जब मैंने तेरी दुहाई दी, उसी दिन तू मेरे पास आ गया था।
तूने मुझ से कहा था, “भयभीत मत हो।”
58 हे यहोवा, मेरे अभियोग में तूने मेरा पक्ष लिया।
मेरे लिये तू मेरा प्राण वापस ले आया।
59 हे यहोवा, तूने मेरी विपत्तियाँ देखी हैं,
अब मेरे लिये तू मेरा न्याय कर।
60 तूने स्वयं देखा है कि शत्रुओं ने मेरे साथ कितना अन्याय किया।
तूने स्वयं देखा है उन सारे षड़यंत्रों को
जो उन्होंने मुझ से बदला लेने को मेरे विरोध में रचे थे।
61 हे यहोवा, तूने सुना है कि वे मेरा अपमान कैसे करते हैं।
तूने सुना है उन षड़यंत्रों को जो उन्होंने मेरे विरोध में रचाये।
62 मेरे शत्रुओं के वचन और विचार
सदा ही मेरे विरुद्ध रहे।
63 देखो यहोवा, चाहे वे बैठे हों, चाहे वे खड़े हों,
कैसे वे मेरी हंसी उड़ाते हैं!
64 हे यहोवा, उनके साथ वैसा ही कर जैसा उनके साथ करना चाहिये!
उनके कर्मो का फल तू उनको दे दे!
65 उनका मन हठीला कर दे!
फिर अपना अभिशाप उन पर डाल दे!
66 क्रोध में भर कर तू उनका पीछा कर!
उन्हें बर्बाद कर दे! हे यहोवा, आकाश के नीचे से तू उन्हें समाप्त कर दे!
यरूशलेम पर हमले का आतंक
4 देखा, किस तरह सोना चमक रहित हो गया।
देखा, सारा सोना कैसे खोटा हो गया।
चारों ओर हीरे—जवाहरात बिखरे पड़े हैं।
हर गली के सिर पर ये रत्न फैले हैं।
2 सिय्योन के निवासी बहुत मूल्यवान थे,
जिनका मूल्य सोने की तोल में तुलना था।
किन्तु अब उनके साथ शत्रु ऐसे बर्ताव करते हैं जैसे वे मिट्टी के पुराने घड़े हों।
शत्रु उनके साथ ऐसा बर्ताव करता है जैसे वे कुम्हार के बनाये मिट्टी के पात्र हों।
3 यहाँ तक कि गीदड़ी भी अपने बच्चे को थन देती है,
वह अपने बच्चे को दूध पीने देती है।
किन्तु मेरे लोग निर्दय हो गये हैं।
वह ऐसे हो गये जैसे मरुभूमि में निवासी—शुतुर्मुर्ग।
4 प्यास के मारे अबोध शिशुओं की जीभ
तालू से चिपक रही है।
ये छोटे बच्चे रोटी को तरसते हैं।
किन्तु कोई भी उन्हें कुछ भी खाने के लिये देता नहीं।
5 ऐसे लोग जो स्वादिष्ट भोजन खाया करते थे,
आज भूख से गलियों में मर रहे हैं।
ऐसे लोग जो उत्तम वस्त्र पहनते हुए पले बढ़े थे,
अब कूड़े के ढेरों पर बीनते फिरते हैं।
6 मेरे लोगों का पाप बहुत बड़ा था।
उनका पाप सदोम और अमोरा के पापों से बड़ा पाप था।
सदोम और अमोरा को अचानक नष्ट किया गया।
उनके विनाश में किसी भी मनुष्य का हाथ नहीं था।
यह तो परमेश्वर ने किया था।
7 यहूदा के लोग जो परमेश्वर को समर्पित थे,
वे बर्फ से उजले थे,
दूध से धुले थे।
उनकी कायाएं मूंग से अधिक लाल थीं।
उनकी दाढ़ियाँ नीलम से श्यामल थी।
8 किन्तु उनके मुख अब धुंए से काले हो गये हैं।
यहाँ तक कि गलियों में उनको कोई नहीं पहचानता था।
उनकी ठठरी पर अब झूर्रियां पड़ रही हैं।
उनका चर्म लकड़ी सा कड़ा हो गया है।
9 ऐसे लोग जिन्हें तलवार के घाट उतारे गये उन से कहीं भाग्यवान थे,
जो लोग भूख—मरी के मारे मरे।
भूख के सताये लोग बहुत ही दु:खी थे, वे बहुत व्याकुल थे।
वे मरे क्योंकि खेतों का दिया हुआ खाने को उनके पास नहीं था।
10 उन दिनों ऐसी स्त्रियों ने भी जो बहुत अच्छी हुआ करती थी,
अपने ही बच्चों के मांस को पकाया था।
वे बच्चे अपनी ही माँओं का आहार बने।
ऐसा तब हुआ था जब मेरे लोगों का विनाश हुआ था।
11 यहोवा ने अपने सब क्रोध का प्रयोग किया;
अपना समूचा क्रोध उसने उंडेल दिया।
सिय्योन में जिसने आग भड़कायी,
सिय्योन की नीवों को नीचे तक जला दिया था।
12 जो कुछ घटा था, धरती के किसी भी राजा को उसका विश्वास नहीं था।
जो कुछ घटा था, धरती के किसी भी लोगों को उसका विश्वास नहीं था।
यरूशलेम के द्वारों से होकर कोई भी शत्रु भीतर आ सकता है,
इसका किसी को भी विश्वास नहीं था।
13 किन्तु ऐसा ही हुआ,
क्योंकि यरूशलेम के नबियों ने पाप किये थे।
ऐसा हुआ क्योंकि यरूशलेम के याजक
बुरे काम किया करते थे।
यरूशलेम के नगर में वे बहुत खून बहाया करते थे;
वे नेक लोगों का खून बहाया करते थे।
14 याजक और नबी गलियों में अंधे से घुमते थे।
खून से वे गंदे हो गये थे।
यहाँ तक कि कोई भी उनका वस्त्र नहीं छूता था
क्योंकि वे गंदे थे।
15 लोग चिल्लाकर कहते थे, “दूर हटो! दूर हटो!
तुम अस्वच्छ हो, हमको मत छूओ।”
वे लोग इधर—उधर यूं ही फिरा करते थे।
उनके पास कोई घर नहीं था।
दूसरी जातियों के लोग कहते थे, “हम नहीं चाहते कि वे हमारे पास रहें।”
16 वे लोग स्वयं यहोवा के द्वारा ही नष्ट किये गये थे।
उसने उनकी ओर फिर कभी नहीं देखा।
उसने याजकों को आदर नहीं दिया।
यहूदा के मुखिया लोगों के साथ वह मित्रता से नहीं रहा।
17 सहायता पाने की बाट जोहते—जोहते अपनी आँखों ने काम करना बंद किया, और अब हमारी आँखें थक गई है।
किन्तु कोई भी सहायता नहीं आई।
हम प्रतीक्षा करते रहे कि कोई ऐसी जाति आये जो हमको बचा ले।
हम अपनी निगरानी बुर्ज से देखते रह गये।
किन्तु किसी ने भी हम को बचाया नहीं।
18 हर समय दुश्मन हमारे पीछे पड़े रहे यहाँ तक कि हम बाहर गली में भी निकल नहीं पाये।
हमारा अंत निकट आया।
हमारा समय पूरा हो चुका था।
हमारा अंत आ गया!
19 वे लोग जो हमारे पीछे पड़े थे,
उनकी गती आकाश में उकाब की गति से तीव्र थी।
उन लोगों ने पहाड़ों के भीतर हमारा पीछा किया।
वे हमको पकड़ने को मरुभूमि में लुके—छिपे थे।
20 वह राजा जो हमारी नाकों के भीतर हमारा प्राण था,
गर्त में फँसा लिया गया था;
वह राजा ऐसा व्यक्ति था
जिसे यहोवा ने स्वयं चुना था।
राजा के बारे में हमने कहा था,
“उसकी छत्र छाया में हम जीवित रहेंगे,
उसकी छाया में हम जातियों के बीच जीवित रहेंगे।”
21 एदोम के लोगों, प्रसन्न रहो और आनन्दित रहो!
हे ऊज के निवासियों, प्रसन्न रहो!
किन्तु सदा याद रखो,
तुम्हारे पास भी यहोवा के क्रोध का प्याला आयेगा।
जब तुम उसे पिओगे, धुत्त हो जाओगे और स्वयं को नंगा कर डालोगे।
22 सिय्योन, तेरा दण्ड पूरा हुआ।
अब फिर से तू कभी बंधन में नहीं पड़ोगी।
किन्तु हे एदोम के लोगों, यहोवा तुम्हारे पापों का दण्ड देगा।
तुम्हारे पापों को वह उघाड़ देगा।
यहोवा से विनती
5 हे यहोवा, हमारे साथ जो घटा हैं, याद रख।
हे यहोवा, हमारे तिरस्कार को देख।
2 हमारी धरती परायों के हाथों में दे दी गयी।
हमारे घर परदेसियों के हाथों में दिये गये।
3 हम अनाथ हो गये।
हमारा कोई पिता नहीं।
हमारी माताएं विधवा सी हो गयी हैं।
4 पानी पीने तक हमको मोल देना पड़ता है, इंधन की लकड़ी तक खरीदनी पड़ती हैं।
5 अपने कन्धों पर हमें जुए का बोझ उठाना पड़ता है।
हम थक कर चूर होते हैं किन्तु विश्राम तनिक हमको नहीं मिलता।
6 हमने मिस्र के साथ एक वाचा किया;
अश्शूर के साथ भी हमने एक वाचा किया था कि पर्याप्त भोजन मिले।
7 हमारे पूर्वजों ने तेरे विरोध में पाप किये थे।
आज वे मर चुके हैं।
अब वे विपत्तियाँ भोग रहे हैं।
8 हमारे दास ही स्वामी बने हैं।
यहाँ कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जो हमको उनसे बचा ले।
9 बस भोजन पाने को हमें अपना जीवन दांव पर लगाना पड़ता है।
मरुभूमि में ऐसे लोगों के कारण जिनके पास तलवार है हमें अपना जीवन दांव पर लगाना पड़ता है।
10 हमारी खाल तन्दूर सी तप रही है,
हमारी खाल तप रही उस भूख के कारण जो हमको लगी हैं।
11 सिय्योन की स्त्रियों के साथ कुकर्म किये गये हैं।
यहूदा की नगरियों की कुमारियों के साथ कुकर्म किये गये हैं।
12 हमारे राजकुमार फाँसी पर चढ़ाये गये;
उन्होंने हमारे अग्रजों का आदर नहीं किया।
13 हमारे वे शत्रुओं ने हमारे युवा पुरुषों से चक्की में आटा पिसवाया।
हमारे युवा पुरुष लकड़ी के बोझ तले ठोकर खाते हुये गिरे।
14 हमारे बुजुर्ग अब नगर के द्वारों पर बैठा नहीं करते।
हमारे युवक अब संगीत में भाग नहीं लेते।
15 हमारे मन में अब कोई खुशी नहीं है।
हमारा हर्ष मरे हुए लोगों के विलाप में बदल गया है।
16 हमारा मुकुट हमारे सिर से गिर गया है।
हमारी सब बातें बिगड़ गयी हैं, क्योंकि हमने पाप किये थे।
17 इसलिये हमारे मन रोगी हुए है; इन ही बातों से हमारी आँखें मद्धिम हुई है।
18 सिय्योन का पर्वत विरान हो गया है।
सिय्योन के पहाड़ पर अब सियार घूमते है।
19 किन्तु हे यहोवा, तेरा राज्य तो अमर हैं।
तेरा महिमापूर्ण सिंहासन सदा—सदा बना रहता है।
20 हे यहोवा, ऐसा लगता है जैसे तू हमको सदा के लिये भूल गया है।
ऐसा लगता है जैसे इतने समय के लिये तूने हमें अकेला छोड़ दिया है।
21 हे यहोवा, हमको तू अपनी ओर मोड़ ले।
हम प्रसन्नता से तेरे पास लौट आयेंगे; हमारे दिन फेर दे जैसे वह पहले थे।
22 क्या तूने हमें पूरी तरह बिसरा दिया
तू हम से बहुत क्रोधित रहा है।
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