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Duration: 365 days
Hindi Bible: Easy-to-Read Version (ERV-HI)
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यिर्मयाह 7-9

यिर्मयाह का मन्दिर उपदेश

यह यहोवा का सन्देश यिर्मयाह के लिये है: यिर्मयाह, यहोवा के मन्दिर के द्वार के सामने खड़े हो। द्वार पर यह सन्देश घोषित करो:

“‘यहूदा राष्ट्र के सभी लोगों, यहोवा के यहाँ का सन्देश सुनो। यहोवा की उपासना करने के लिये तुम सभी लोग जो इन द्वारों से होकर आए हो इस सन्देश को सुनो। इस्राएल के लोगों का परमेश्वर यहोवा है। सर्वशक्तिमान यहोवा जो कहता है, वह यह है, अपना जीवन बदलो और अच्छे काम करो। यदि तुम ऐसा करोगे तो मैं तुम्हें इस स्थान पर रहने दूँगा। इस झूठ पर विश्वास न करो जो कुछ लोग बोलते हैं। वे कहते हैं, “यह यहोवा का मन्दिर है। यहोवा का मन्दिर है! यहोवा का मन्दिर है!” यदि तुम अपना जीवन बदलोगे और अच्छा काम करोगे, तो मैं तुम्हें इस स्थान पर रहने दूँगा। तुम्हें एक दूसरे के प्रति निष्ठावान होना चाहिए। तुम्हें अजनबियों के साथ भी निष्ठावान होना चाहिये। तुम्हें विधवा और अनाथ बच्चों के लिये उचित काम करना चाहिये। निरपराध लोगों को न मारो। अन्य देवताओं का अनुसरण न करो। क्यों क्योंकि वे तुम्हारे जीवन को नष्ट कर देंगे। यदि तुम मेरी आज्ञा का पालन करोगे तो मैं तुम्हें इस स्थान पर रहने दूँगा। मैंने यह प्रदेश तुम्हारे पूर्वजों को अपने पास सदैव रखने के लिये दिया।

“‘किन्तु तुम झूठ में विश्वास कर रहे हो और वह झूठ व्यर्थ है। क्या तुम चोरी और हत्या करोगे क्या तुम व्यभिचार का पाप करोगे क्या तुम लोगों पर झूठा आरोप लगाओगे क्या तुम असत्य देवता बाल की पूजा करोगे और अन्य देवताओं का अनुसरण करोगे जिन्हें तुम नहीं जानते 10 यदि तुम ये पाप करते हो तो क्या तुम समझते हो कि तुम उस मन्दिर में मेरे सामने खड़े हो सकते हो जिसे मेरे नाम से पुकारा जाता हो क्या तुम सोचते हो कि तुम मेरे सामने खड़े हो सकते हो और कह सकते हो, “हम सुरक्षित हैं” सुरक्षित इसलिये कि जिससे तुम ये घृणित कार्य कर सको। 11 यह मन्दिर मेरे नाम से पुकारा जाता है। क्या यह मन्दिर तुम्हारे लिये डकैतों के छिपने के स्थान के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है मैं तुम्हारी चौकसी रख रहा हूँ।’” यह सन्देश यहोवा का है।

12 “‘यहूदा के लोगों, तुम अब शीलो नगर को जाओ। उस स्थान पर जाओ जहाँ मैंने प्रथम बार अपने नाम का मन्दिर बनाया। इस्राएल के लोगों ने भी पाप कर्म किये। जाओ और देखो कि उस स्थान का मैंने उन पाप कर्मों के लिये क्या किया जो उन्होंने किये। 13 इस्राएल के लोगों, तुम लोग ये सब पाप कर्म करते रहे। यह सन्देश यहोवा का था! मैंने तुमसे बार—बार बातें कीं, किन्तु तुमने मेरी अनसुनी कर दी। मैंने तुम लोगों को पुकारा पर तुमने उत्तर नहीं दिया। 14 इसलिये मैं अपने नाम से पुकारे जाने वाले यरूशलेम के इस मन्दिर को नष्ट करूँगा। मैं उस मन्दिर को वैसे ही नष्ट करूँगा जैसे मैंने शीलो को नष्ट किया और यरूशलेम में वह मन्दिर जो मेरे नाम पर हैं, वही मन्दिर है जिसमें तुम विश्वास करते हो। मैंने उस स्थान को तुम्हें और तुम्हारे पूर्वजों को दिया। 15 मैं तुम्हें अपने पास से वैसे ही दूर फेंक दूँगा जैसे मैंने तुम्हारे सभी भाईयों को एप्रैम से फेंका।’

16 “यिर्मयाह, जहाँ तक तुम्हारी बात है, तुम यहूदा के इन लोगों के लिये प्रार्थना मत करो। न उनके लिये याचना करो और न ही उनके लिये प्रार्थना। उनकी सहायता के लिये मुझसे प्रार्थना मत करो। उनके लिये तुम्हारी प्रार्थना को मैं नहीं सुनूँगा। 17 मैं जानता हूँ कि तुम देख रहे हो कि वे यहूदा के नगर में क्या कर रहे हैं तुम देख सकते हो कि वे यरूशलेम नगर की सड़कों पर क्या कर रहे हैं 18 यहूदा के लोग जो कर रहे हैं वह यह है: बच्चे लकड़ियाँ इकट्ठी करते हैं। पिता लोग उस लकड़ी का उपयोग आग जलाने में करते हैं। स्त्रियाँ आटा गूँधती हैं और स्वर्ग की रानी की भेंट के लिये रोटियाँ बनाती हैं। यहूदा के वे लोग अन्य देवताओं की पूजा के लिये पेय भेंट चढ़ाते हैं। वे मुझे क्रोधित करने के लिये यह करते हैं। 19 किन्तु मैं वह नहीं हूँ जिसे यहूदा के लोग सचमुच चोट पहुँचा रहे हैं।” यह सन्देश यहोवा का है। “वे केवल अपने को ही चोट पहुँचा रहे हैं। वे अपने को लज्जा का पात्र बना रहे हैं।”

20 अत: यहोवा यह कहता है: “मैं अपना क्रोध इस स्थान के विरुद्ध प्रकट करुँगा। मैं लोगों तथा जानवरों को दण्ड दूँगा। मैं खेत में पेड़ों और उस भूमि में उगनेवाली फसलों को दण्ड दूँगा। मेरा क्रोध प्रचण्ड अग्नि सा होगा और कोई व्यक्ति उसे रोक नहीं सकेगा।”

यहोवा बलि की अपेक्षा, अपनी आज्ञा का पालन अधिक चाहता है

21 इस्राएल का परमेश्वर सर्वशक्तिमान यहोवा यह कहता है, “जाओ और जितनी भी होमबलि और बलि चाहो, भेंट करो। उन बलियों के माँस स्वयं खाओ। 22 मैं तुम्हारे पूर्वजों को मिस्र से बाहर लाया। मैंने उनसे बातें कीं, किन्तु उन्हें कोई आदेश होमबलि और बलि के विषय में नहीं दिया। 23 मैंने उन्हें केवल यह आदेश दिया, ‘मेरी आज्ञा का पालन करो और मैं तुम्हारा परमेश्वर रहूँगा तथा तुम मेरे लोग होगे। जो मैं आदेश देता हूँ वह करो, और तुम्हारे लिए सब अच्छा होगा।’

24 “किन्तु तुम्हारे पूर्वजों ने मेरी एक न सुनी। उन्होंने मुझ पर ध्यान नहीं दिया। वे हठी रहे और उन्होंने उन कामों को किया जो वे करना चाहते थे। वे अच्छे न बने। वे पहले से भी अधिक बुरे बने, वे पीछे को गए, आगे नहीं बढ़े। 25 उस दिन से जिस दिन तुम्हारे पूर्वजों ने मिस्र छोड़ा आज तक मैंने अपने सेवकों को तुम्हारे पास भेजा है। मेरे सेवक नबी हैं। मैंने उन्हें तुम्हारे पास बारबार भेजा। 26 किन्तु तुम्हारे पूर्वजों ने मेरी अनसुनी की। उन्होंने मुझ पर ध्यान नहीं दिया। वे बहुत हठी रहे, और उन्होंने अपने पूर्वजों से भी बढ़कर बुराईयाँ कीं।

27 “यिर्मयाह, तुम यहूदा के लोगों से ये बातें कहोगे। किन्तु वे तुम्हारी एक न सुनेंगे। तुम उनसे बातें करोगे किन्तु वे तुम्हें जवाब भी नहीं देंगे। 28 इसलिये तुम्हें उनसे ये बातें कहनी चाहियें: यह वह राष्ट्र है जिसने यहोवा अपने परमेश्वर की आज्ञा का पालन नहीं किया। इन लोगों ने परमेश्वर की शिक्षाओं को अनसुनी किया। ये लोग सच्ची शिक्षा नहीं जानते।

हत्या—घाटी

29 “यिर्मयाह, अपने बालों को काट डालो और इसे फेंक दो। पहाड़ी की नंगी चोटी पर चढ़ो और रोओ चिल्लाओ। क्यों क्योंकि यहोवा ने इस पीढ़ी के लोगों को दुत्कार दिया है। यहोवा ने इन लोगों से अपनी पीठ मोड़ ली है और वह क्रोध में इन्हें दण्ड देगा। 30 ये करो क्योंकि मैंने यहूदा के लोगों को पाप करते देखा है।” यह सन्देश यहोवा का है। “उन्होंने अपनी देवमूर्तियाँ स्थापित की हैं और मैं उन देवमूर्तियों से घृणा करता हूँ। उन्होंने देवमूर्तियों को उस मन्दिर में स्थापित किया है जो मेरे नाम से है। उन्होंने मेरे मन्दिर को ‘गन्दा’ कर दिया है। 31 यहूदा के उन लोगों ने बेन—हिन्नोम घाटी में तोपेत के उच्च स्थान बनाए हैं। उन स्थानों पर लोग अपने पुत्र—पुत्रियों को मार डालते थे, वे उन्हें बलि के रूप में जला देते थे। यह ऐसा है जिसके लिये मैंने कभी आदेश नहीं दिया। इस प्रकार की बात कभी मेरे मन में आई ही नहीं! 32 अत: मैं तुम्हें चेतावनी देता हूँ। वे दिन आ रहे हैं।” यह सन्देश यहोवा का है, “जब लोग इस स्थान को तोपेत या बेन—हिन्नोम की घाटी फिर नहीं कहेंगे। नहीं, वे इसे हत्याघाटी कहेंगे। वे इसे यह नाम इसलिये देंगे कि वे तोपेत में इतने व्यक्तियों को दफनायेंगे कि उनके लिये किसी अन्य को दफनाने की जगह नहीं बचेगी। 33 तब लोगों के शव जमीन के ऊपर पड़े रहेंगे और आकाश के पक्षियों के भोजन होंगे। उन लोगों के शरीर को जंगली जानवर खायेंगे। वहाँ उन पक्षियों और जानवरों को भगाने के लिये कोई व्यक्ति जीवित नहीं बचेगा। 34 मैं आनन्द और प्रसन्नता के कहकहों को यहूदा के नगरों और यरूशलेम की सड़कों पर समाप्त कर दूँगा। यहूदा और यरूशलेम में दुल्हन और दुल्हे की हँसी—ठिठोली अब से आगे नहीं सुनाई पड़ेगी। पूरा प्रदेश सूनी मरुभूमि बन जाएगा।”

यह सन्देश यहोवा का है: “उस समय लोग यहूदा के राजाओं और प्रमुख शासकों की हड्डियों को उनके कब्रों से निकाल लेंगे। वे याजकों और नबियों की हड्डियों को उनके कब्रों से ले लेंगे। वे यरूशलेम के सभी लोगों के कब्रों से हड्डियाँ निकाल लेंगे। वे लोग उन हड्डियों को सूर्य, चन्द्र और तारों की पूजा के लिये नीचे जमीन पर फैलायेंगे। यरूशलेम के लोग सूर्य, चन्द्र और तारों की पूजा से प्रेम करते हैं। कोई भी व्यक्ति उन हड्डियाँ को इकट्ठा नहीं करेगा और न ही उन्हें फिर दफनायेगा। अत: उन लोगों की हड्डियाँ गोबर की तरह जमीन पर पड़ी रहेंगी।

“मैं यहूदा के लोगों को अपना घर और प्रदेश छोड़ने पर विवश करूँगा। लोग विदेशों में ले जाए जाएंगे। यहूदा के वे कुछ लोग जो युद्ध में नहीं मारे जा सके, चाहेंगे कि वे मार डाले गए होते।” यह सन्देश यहोवा का है।

पाप और दण्ड

यिर्मयाह, यहूदा के लोगों से यह कहो कि यहोवा यह सब कहता है,

“‘तुम यह जानते हो कि जो व्यक्ति गिरता है
    वह फिर उठता है।
और यदि कोई व्यक्ति गलत राह पर चलता है
    तो वह चारों ओर से घूम कर लौट आता है।
यहूदा के लोग गलत राह चले गए हैं।
किन्तु यरूशलेम के वे लोग गलत राह चलते ही क्यों जा रहे हैं
वे अपने झूठ में विश्वास रखते हैं।
    वे मुड़ने तथा लौटने से इन्कार करते हैं।
मैंने उनको ध्यान से सुना है,
    किन्तु वे वह नहीं कहते जो सत्य है।
लोग अपने पाप के लिये पछताते नहीं।
    लोग उन बुरे कामों पर विचार नहीं करते जिन्हें उन्होंने किये हैं।
परत्येक अपने मार्ग पर वैसे ही चला जा रहा है।
    वे युद्ध में दौड़ते हुए घोड़ों के समान हैं।
आकाश के पक्षी भी काम करने का ठीक समय जानते हैं।
    सारस, कबूतर, खन्जन और मैना भी जानते हैं
कि कब उनको अपने नये घर में उड़ कर जाना है।
    किन्तु मेरे लोग नहीं जानते कि
यहोवा उनसे क्या कराना चाहता है।

“‘तुम कहते रहते हो, “हमे यहोवा की शिक्षा मिली है।
    अत: हम बुद्धिमान हैं!”
किन्तु यह सत्य नहीं! क्योंकि शास्त्रियों ने अपनी लेखनी से झूठ उगला है।
उन “चतुर लोगों” ने यहोवा की शिक्षा अनसुनी की है अत:
    सचमुच वे वास्तव में बुद्धिमान लोग नहीं हैं।
वे “चतुर लोग” जाल में फँसाये गए।
    वे काँप उठे और लज्जित हुए।
10 अत: मैं उनकी पत्नियों को अन्य लोगों को दूँगा।
    मैं उनके खेत को नये मालिकों को दे दूँगा।
इस्राएल के सभी लोग अधिक से अधिक धन चाहते हैं।
    छोटे से लेकर बड़े से बड़े सभी लोग उसी तरह के हैं।
    सभी लोग नबी से लेकर याजक तक सब झूठ बोलते हैं।
11 नबी और याजक हमारे लोगों के घावों को भरने का प्रयत्न ऐसे करते हैं
    मानों वे छोटे से घाव हों।
वे कहते हैं, “यह बिल्कुल ठीक है, यह बिल्कुल ठीक है।”
    किन्तु यह बिल्कुल ठीक नहीं।
12 उन लोगों को अपने किये बुरे कामों के लिये लज्जित होना चाहिये।
    किन्तु वे बिल्कुल लज्जित नहीं।
उन्हें इतना भी ज्ञान नहीं कि उन्हें अपने पापों के लिये ग्लानि हो सके अत:
    वे अन्य सभी के साथ दण्ड पायेंगे।
मैं उन्हें दण्ड दूँगा और जमीन पर फेंक दूँगा।’”
    ये बातें यहोवा ने कहीं।
13 “‘मैं उनके फल और फसलें ले लूँगा जिससे उनके यहाँ कोई पकी फसल नहीं होगी।
    अंगूर की बेलों में कोई अंगूर नहीं होंगे।
अंजीर के पेड़ों पर कोई अंजीर नहीं होगा।
    यहाँ तक कि पत्तियाँ सूखेंगी और मर जाएंगी।
मैं उन चीज़ों को ले लूँगा जिन्हें मैंने उन्हें दे दी थी।’”

14 “‘हम यहाँ खाली क्यों बैठे हैं आओ, दृढ़ नगरों को भाग निकलो।
    यदि हमारा परमेश्वर यहोवा हमें मारने ही जा रहा है, तो हम वहीं मरें।
हमने यहोवा के विरुद्ध पाप किया है अत: परमेश्वर ने हमें पीने को जहरीला पानी दिया है।
15 हम शान्ति की आशा करते थे, किन्तु कुछ भी अच्छा न हो सका।
    हम ऐसे समय की आशा करते हैं, जब वह क्षमा कर देगा किन्तु केवल विपत्ति ही आ पड़ी है।
16 दान के परिवार समूह के प्रदेश से
    हम शत्रु के घोड़ों के नथनों के फड़फड़ाने की आवाज सुनते हैं,
उनकी टापों से पृथ्वी काँप उठी है,
    वे प्रदेश और इसमें की सारी चीज़ों को नष्ट करने आए है।
वे नगर और इसके निवासी सभी लोगों को जो वहाँ रहते हैं,
    नष्ट करने आए हैं।’”

17 “यहूदा के लोगों, मैं तुम्हें डसने को विषैले साँप भेज रहा हूँ।
    उन साँपों को सम्मोहित नहीं किया जा सकता।
वे ही साँप तुम्हें डसेंगे।”
    यह सन्देश यहोवा का है।

18 परमेश्वर, मैं बहुत दु:खी और भयभीत हूँ।
19 मेरे लोगों की सुन।
    इस देश में वे चारों ओर सहायता के लिए पुकार रहे हैं।
वे कहते हैं, “क्या यहोवा अब भी सिय्योन में है?
    क्या सिय्योन के राजा अब भी वहाँ है?”

किन्तु परमेश्वर कहता है,
“यहूदा के लोग, अपनी देव मूर्तियों की पूजा करके
    मुझे क्रोधित क्यों करते हैं,
    उन्होंने अपने व्यर्थ विदेशी देव मूर्तियों की पूजा की है।”
20 लोग कहते हैं,
    “फसल काटने का समय गया।
बसन्त गया
    और हम बचाये न जा सके।”

21 मेरे लोग बीमार है, अत: मैं बीमार हूँ।
    मैं इन बीमार लोगों की चिन्ता में दुःखी और निराश हूँ।
22 निश्चय ही, गिलाद प्रदेश में कुछ दवा है।
    निश्चय ही गिलाद प्रदेश में वैद्य है।
    तो भी मेरे लोगों के घाव क्यों अच्छे नहीं होते?

यदि मेरा सिर पानी से भरा होता,
    और मेरी आँखें आँसू का झरना होतीं तो मैं अपने नष्ट किये गए
    लोगों के लिए दिन रात रोता रहता।

यदि मुझे मरुभूमि में रहने का स्थान मिल गया होता
    जहाँ किसी घर में यात्री रात बिताते, तो मैं अपने लोगों को छोड़ सकता था।
मैं उन लोगों से दूर चला जा सकता था।
    क्यों क्योंकि वे सभी परमेश्वर के विश्वासघाती व व्यभिचारी हो गए हैं, वे सभी उसके विरुद्ध हो रहे हैं।

“वे लोग अपनी जीभ का उपयोग धनुष जैसा करते हैं,
    उनके मुख से झूठ बाण के समान छूटते हैं।
पूरे देश में सत्य नहीं। झूठ प्रबल हो गया है, वे लोग एक पाप से दूसरे पाप करते जाते हैं।
    वे मुझे नहीं जानते।” यहोवा ने ये बातें कहीं।

“अपने पड़ोसियों से सतर्क रहो, अपने निज भाइयों पर भी विश्वास न करो।
    क्यों क्योंकि हर एक भाई ठग हो गया है।
हर पड़ोसी तुम्हारे पीठ पीछे बात करता है।
हर एक व्यक्ति अपने पड़ोसी से झूठ बोलता है।
    कोई व्यक्ति सत्य नहीं बोलता।
यहूदा के लोगों ने अपनी जीभ को झूठ बोलने की शिक्षा दी है।
    उन्होंने तब तक पाप किये जब तक कि वे इतने थके कि लौट न सकें।
एक बुराई के बाद दूसरी बुराई आई।
    झूठ के बाद झूठ आया।
लोगों ने मुझको जानने से इन्कार कर दिया।”
    यहोवा ने ये बातें कहीं।

अत: सर्वशक्तिमान यहोवा कहता है,
    “मैं यहूदा के लोगों की परीक्षा वैसे ही करूँगा
जैसे कोई व्यक्ति आग में तपाकर किसी धातु की परीक्षा करता है।
    मेरे पास अन्य विकल्प नहीं है।
मेरे लोगों ने पाप किये हैं।
यहूदा के लोगों की जीभ तेज बाणों की तरह हैं।
    उनके मुँह से झूठ बरसता है।
हर एक व्यक्ति अपने पड़ोसी से अच्छा बोलता है।
    किन्तु वह छिपे अपने पड़ोसी पर आक्रमण करने की योजना बनाता है।
क्या मुझे यहूदा के लोगों को इन कामों के करने के लिये दण्ड नहीं देना चाहिए”
    यह सन्देश यहोवा का है।
“तुम जानते हो कि मुझे इस प्रकार के लोगों को दण्ड देना चाहिए।
    मैं उनको वह दण्ड दूँगा जिसके वे पात्र हैं।”
10 मैं (यिर्मयाह) पर्वतों के लिये फूट फूट कर रोऊँगा।
    मैं खाली खेतों के लिये शोकगीत गाऊँगा।
क्यों क्योंकि जीवित वस्तुएँ छीन ली गई।
    कोई व्यक्ति वहाँ यात्रा नहीं करता।
उन स्थान पर पशु ध्वनि नहीं सुनाई पड़ सकती।
    पक्षी उड़ गए हैं और जानवर चले गए हैं।
11 “मैं (यहोवा) यरूशलेम नगर को कूड़े का ढेर बना दूँगा।
    यह गीदड़ों की माँदे बनेगा।
मैं यहूदा देश के नगरों को नष्ट करूँगा अत: वहाँ कोई भी नहीं रहेगा।”

12 क्या कोई व्यक्ति ऐसा बुद्धिमान है जो इन बातों को समझ सके क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जिसे यहोवा से शिक्षा मिली है क्या कोई यहोवा के सन्देश की व्य़ाख्य़ा कर सकता है देश क्यों नष्ट हुआ यह एक सूनी मरुभूमि की तरह क्यों कर दिया गया जहाँ कोई भी नहीं जाता 13 यहोवा ने इन प्रश्नों का उत्तर दिया। उसने कहा, “यह इसलिये हुआ कि यहूदा के लोगों ने मेरी शिक्षा पर चलना छोड़ दिया। मैंने उन्हें अपनी शिक्षा दी, किन्तु उन्होंने मेरी सुनने से इन्कार किया। उन्होंने मेरे उपदेशों का अनुसरण नहीं किया। 14 यहूदा के लोग अपनी राह चले, वे हठी रहे। उन्होंने असत्य देवता बाल का अनुसरण किया। उनके पूर्वजों ने उन्हें असत्य देवताओं के अनुसरण करने की शिक्षा दी।”

15 अत: इस्राएल का परमेश्वर सर्वशक्तिमान यहोवा कहता है, “मैं शीघ्र ही यहूदा के लोगों को कड़वा फल चखाऊँगा। मैं उन्हें जहरीला पानी पिलाऊँगा। 16 मैं यहूदा के लोगों को अन्य राष्ट्रों में बिखेर दूँगा। वे अजनबी राष्ट्रों में रहेंगे। उन्होंने और उनके पूर्वजों ने उन देशों को कभी नहीं जाना। मैं तलवार लिये व्यक्तियों को भेंजूँगा। वे लोग यहूदा के लोगों को मार डालेंगे। वे लोगों को तब तक मारते जाएंगे जब तक वे समाप्त नहीं हो जाएंगे।”

17 सर्वशक्तिमान यहोवा जो कहता है, वह यह है:
    “अब इन सबके बारे में सोचो।
अन्त्येष्टि के समय भाड़े पर रोने वाली स्त्रियों को बुलाओ।
    उन स्त्रियों को बुलाओ जो विलाप करने में चतुर हों।”
18 लोग कहते हैं,
    “उन स्त्रियों को जल्दी से आने और हमारे लिये रोने दो,
तब हमारी आँखे आँसू से भरेंगी
    और पानी की धारा हमारी आँखों से फूट पड़ेगी।”
19 “जोर से रोने की आवाजें सिय्योन से सुनी जा रही हैं।
    ‘हम सचमुच बरबाद हो गए। हम सचमुच लज्जित हैं।
हमें अपने देश को छोड़ देना चाहिये,
    क्योंकि हमारे घर नष्ट और बरबाद हो गये हैं।
हमारे घर अब केवल पत्थरों के ढेर हो गये हैं।’”

20 यहूदा की स्त्रियों, अब यहोवा का सन्देश सुनो।
    यहोवा के मुख से निकले शब्दों को सुनने के लिये अपने कान खोल लो।
यहोवा कहता है अपनी पुत्रियों को जोर से रोना सिखाओ।
    हर एक स्त्री को इस शोक गीत को सीख लेना चाहिये:
21 “मृत्यु हमारी खिड़कियों से चढ़कर आ गई है।
    मृत्यु हमारे महलों में घुस गई है।
सड़क पर खेलने वाले हमारे बच्चों की मृत्यु आ गई है।
    सामाजिक स्थानों में मिलने वाले युवकों की मृत्यु हो गई है।”

22 यिर्मयाह कहो, “जो यहोवा कहता है, ‘वह यह है:
मनुष्यों के शव खेतों में गोबर से पड़े रहेंगे।
    उनके शव जमीन पर उस फसल से पड़े रहेंगे जिन्हें किसान ने काट डाला है।
किन्तु उनको इकट्ठा करने वाला कोई नहीं होगा।’”

23 यहोवा कहता है,
    “बुद्धिमान को अपनी बुद्धिमानी की डींग नहीं मारनी चाहिए।
शक्तिशाली को अपने बल का बखान नहीं करना चाहिए।
    सम्पत्तिशाली को अपनी सम्पत्ति की हवा नहीं बांधनी चाहिए।
24 किन्तु यदि कोई डींग मारना ही चाहता है तो उसे इन चीज़ों की डींग मारने दो:
    उसे इस बैंत की डींग मारने दो कि वह मुझे समझता और जानता है।
उसे इस बात की डींग हाँकने दो कि वह यह समझता है कि मैं यहोवा हूँ।
    उसे इस बात की हवा बांधने दो कि मैं कृपालु और न्यायी हूँ।
उसे इस बात का ढींढोरा पीटने दो कि मैं पृथ्वी पर अच्छे काम करता हूँ।
    मुझे इन कामों को करने से प्रेम है।”
यह सन्देश यहोवा का है।

25 वह समय आ रहा है, यह सन्देश यहोवा का है, “जब मैं उन लोगों को दण्ड दूँगा जो केवल शरीर से खतना कराये हैं। 26 मैं मिस्र, यहूदा, एदोम, अम्मोन तथा मोआब के राष्ट्रों और उन सभी लोगों के बारे में बातें कर रहा हूँ जो मरुभूमि में रहते हैं जो दाढ़ी के किनारों के बालों को काटते हैं। उन सभी देशों के लोगों ने अपने शरीर का खतना नहीं करवाया है। किन्तु इस्राएल के परिवार के लोगों ने हृदय से खतना को नहीं ग्रहण किया है, जैसे कि परमेश्वर के लोगों को करना चाहिए।”

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