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Hindi Bible: Easy-to-Read Version (ERV-HI)
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अय्यूब 11-13

सोपर का अय्यूब से कथन

11 इस पर नामात नामक प्रदेश के सोपर ने अय्यूब को उत्तर देते हुये कहा,

“इस शब्दों के प्रवाह का उत्तर देना चाहिये।
    क्या यह सब कहना अय्यूब को निर्दोंष ठहराता है? नहीं!
अय्यूब, क्या तुम सोचते हो कि
    हमारे पास तुम्हारे लिये उत्तर नहीं है?
क्या तुम सोचते हो कि जब तुम परमेश्वर पर
    हंसते हो तो कोई तुम्हें चेतावनी नहीं देगा।
अय्यूब, तुम परमेश्वर से कहते रहे कि,
    ‘मेरा विश्वास सत्य है
    और तू देख सकता है कि मैं निष्कलंक हूँ!’
अय्यूब, मेरी ये इच्छा है कि परमेश्वर तुझे उत्तर दे,
    यह बताते हुए कि तू दोषपूर्ण है!
काश! परमेश्वर तुझे बुद्धि के छिपे रहस्य बताता
    और वह सचमुच तुझे उनको बतायेगा! हर कहानी के दो पक्ष होते हैं,
अय्यूब, मेरी सुन परमेश्वर तुझे कम दण्डित कर रहा है,
    अपेक्षाकृत जितना उसे सचमुच तुझे दण्डित करना चाहिये।

“अय्यूब, क्या तुम सर्वशक्तिमान परमेश्वर के रहस्यपूर्ण सत्य समझ सकते हो?
    क्या तुम उसके विवेक की सीमा मर्यादा समझ सकते हो?
उसकी सीमायें आकाश से ऊँची है,
    इसलिये तुम नहीं समझ सकते हो!
सीमायें नर्क की गहराईयों से गहरी है,
    सो तू उनको समझ नहीं सकता है!
वे सीमायें धरती से व्यापक हैं,
    और सागर से विस्तृत हैं।

10 “यदि परमेश्वर तुझे बंदी बनाये और तुझको न्यायालय में ले जाये,
    तो कोई भी व्यक्ति उसे रोक नहीं सकता है।
11 परमेश्वर सचमुच जानता है कि कौन पाखण्डी है।
    परमेश्वर जब बुराई को देखता है, तो उसे याद रखता है।
12 किन्तु कोई मूढ़ जन कभी बुद्धिमान नहीं होगा,
    जैसे बनैला गधा कभी मनुष्य को जन्म नहीं दे सकता है।
13 सो अय्यूब, तुझको अपना मन तैयार करना चाहिये, परमेश्वर की सेवा करने के लिये।
    तुझे अपने निज हाथों को प्रार्थना करने को ऊपर उठाना चाहिये।
14 वह पाप जो तेरे हाथों में बसा है, उसको तू दूर कर।
    अपने तम्बू में बुराई को मत रहने दे।
15 तभी तू निश्चय ही बिना किसी लज्जा के आँख ऊपर उठा कर परमेश्वर को देख सकता है।
    तू दृढ़ता से खड़ा रहेगा और नहीं डरेगा।
16 अय्यूब, तब तू अपनी विपदा को भूल पायेगा।
    तू अपने दुखड़ो को बस उस पानी सा याद करेगा जो तेरे पास से बह कर चला गया।
17 तेरा जीवन दोपहर के सूरज से भी अधिक उज्जवल होगा।
    जीवन की अँधेरी घड़ियाँ ऐसे चमकेगी जैसे सुबह का सूरज।
18 अय्यूब, तू सुरक्षित अनुभव करेगा क्योंकि वहाँ आशा होगी।
    परमेश्वर तेरी रखवाली करेगा और तुझे आराम देगा।
19 चैन से तू सोयेगा, कोई तुझे नहीं डरायेगा
    और बहुत से लोग तुझ से सहायता माँगेंगे!
20 किन्तु जब बुरे लोग आसरा ढूढेंगे तब उनको नहीं मिलेगा।
    उनके पास कोई आस नहीं होगी।
वे अपनी विपत्तियों से बच कर निकल नहीं पायेंगे।
    मृत्यु ही उनकी आशा मात्र होगी।”

सोपर को अय्यूब का उत्तर

12 फिर अय्यूब ने सोपर को उत्तर दिया:

“निःसन्देह तुम सोचते हो कि मात्र
    तुम ही लोग बुद्धिमान हो,
तुम सोचते हो कि जब तुम मरोगे तो
    विवेक मर जायेगा तुम्हारे साथ।
किन्तु तुम्हारे जितनी मेरी बुद्धि भी उत्तम है,
    मैं तुम से कुछ घट कर नहीं हूँ।
ऐसी बातों को जैसी तुम कहते हो,
    हर कोई जानता है।

“अब मेरे मित्र मेरी हँसी उड़ाते हैं,
    वह कहते है: ‘हाँ, वह परमेश्वर से विनती किया करता था, और वह उसे उत्तर देता था।
इसलिए यह सब बुरी बातें उसके साथ घटित हो रही है।’
    यद्यपि मैं दोषरहित और खरा हूँ, लेकिन वे मेरी हँसी उड़ाते हैं।
ऐसे लोग जिन पर विपदा नहीं पड़ी, विपदाग्रस्त लोगों की हँसी किया करते हैं।
    ऐसे लोग गिरते हुये व्यक्ति को धक्का दिया करते हैं।
डाकुओं के डेरे निश्चिंत रहते हैं,
    ऐसे लोग जो परमेश्वर को रुष्ट करते हैं, शांति से रहते हैं।
    स्वयं अपने बल को वह अपना परमेश्वर मानते हैं।

“चाहे तू पशु से पूछ कर देख,
    वे तुझे सिखादेंगे,
अथवा हवा के पक्षियों से पूछ
    वे तुझे बता देंगे।
अथवा तू धरती से पूछ ले
    वह तुझको सिखा देगी
या सागर की मछलियों को
    अपना ज्ञान तुझे बताने दे।
हर कोई जानता है कि परमेश्वर ने इन सब वस्तुओं को रचा है।
10 हर जीवित पशु और हर एक प्राणी जो साँस लेता है,
    परमेश्वर की शक्ति के अधीन है।
11 जैसे जीभ भोजन का स्वाद चखती है,
    वैसी ही कानों को शब्दों को परखना भाता है।
12 हम कहते है, ‘ऐसे ही बूढ़ों के पास विवेक रहता है और लम्बी आयु समझ बूझ देती है।’
13 विवेक और सामर्थ्य परमेश्वर के साथ रहते है, सम्मत्ति और सूझ—बूझ उसी की ही होती है।
14 यदि परमेश्वर किसी वस्तु को ढा गिराये तो, फिर लोग उसे नहीं बना सकते।
    यदि परमेश्वर किसी व्यक्ति को बन्दी बनाये, तो लोग उसे मुक्त नहीं कर सकते।
15 यदि परमेश्वर वर्षा को रोके तो धरती सूख जायेगी।
    यदि परमेश्वर वर्षा को छूट दे दे, तो वह धरती पर बाढ़ ले आयेगी।
16 परमेश्वर समर्थ है और वह सदा विजयी होता है।
    वह व्यक्ति जो छलता है और वह व्यक्ति जो छला जाता है दोनो परमेश्वर के हैं।
17 परमेश्वर मन्त्रियों को बुद्धि से वंचित कर देता है,
    और वह प्रमुखों को ऐसा बना देता है कि वे मूर्ख जनों जैसा व्यवहार करने लगते हैं।
18 राजा बन्दियों पर जंजीर डालते हैं किन्तु उन्हें परमेश्वर खोल देता है।
    फिर परमेश्वर उन राजाओं पर एक कमरबन्द बांध देता है।
19 परमेश्वर याजकों को बन्दी बना कर, पद से हटाता है और तुच्छ बना कर ले जाता है।
    वह बलि और शक्तिशाली लोगों को शक्तिहीन कर देता है।
20 परमेश्वर विश्वासपात्र सलाह देनेवाले को चुप करा देता है।
    वह वृद्ध लोगों का विवेक छीन लेता है।
21 परमेश्वर महत्वपूर्ण हाकिमों पर घृणा उंडेल देता है।
    वह शासकों की शक्ति छीन लिया करता है।
22 परमेश्वर गहन अंधकार से रहस्यपूर्ण सत्य को प्रगट करता है।
    ऐसे स्थानों में जहाँ मृत्यु सा अंधेरा है वह प्रकाश भेजता है।
23 परमेश्वर राष्ट्रों को विशाल और शक्तिशाली होने देता है,
    और फिर उनको वह नष्ट कर डालता है।
वह राष्ट्रों को विकसित कर विशाल बनने देता है,
    फिर उनके लोगों को वह तितर—बितर कर देता है।
24 परमेश्वर धरती के प्रमुखों को मूर्ख बना देता है, और उन्हें नासमझ बना देता है।
    वह उनको मरुभूमि में जहाँ कोई राह नहीं भटकने को भेज देता है।
25 वे प्रमुख अंधकार के बीच टटोलते हैं, कोई भी प्रकाश उनके पास नहीं होता है।
    परमेश्वर उनको ऐसे चलाता है, जैसे पी कर धुत्त हुये लोग चलते हैं।”

13 अय्यूब ने कहा:

“मेरी आँखों ने यह सब पहले देखा है
    और पहले ही मैं सुन चुका हूँ जो कुछ तुम कहा करते हो।
    इस सब की समझ बूझ मुझे है।
मैं भी उतना ही जानता हूँ जितना तू जानता है,
    मैं तुझ से कम नहीं हूँ।
किन्तु मुझे इच्छा नहीं है कि मैं तुझ से तर्क करूँ,
    मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर से बोलना चाहता हूँ।
    अपने संकट के बारे में, मैं परमेश्वर से तर्क करना चाहता हूँ।
किन्तु तुम तीनो लोग अपने अज्ञान को मिथ्या विचारों से ढकना चाहते हो।
    तुम वो बेकार के चिकित्सक हो जो किसी को अच्छा नहीं कर सकता।
मेरी यह कामना है कि तुम पूरी तरह चुप हो जाओ,
    यह तुम्हारे लिये बुद्धिमत्ता की बात होगी जिसको तुम कर सकते हो!

“अब, मेरी युक्ति सुनो!
    सुनो जब मैं अपनी सफाई दूँ।
क्या तुम परमेश्वर के हेतु झूठ बोलोगे?
    क्या यह तुमको सचमुच विश्वास है कि ये तुम्हारे झूठ परमेश्वर तुमसे बुलवाना चाहता है
क्या तुम मेरे विरुद्ध परमेश्वर का पक्ष लोगे?
    क्या तुम न्यायालय में परमेश्वर को बचाने जा रहे हो?
यदि परमेश्वर ने तुमको अति निकटता से जाँच लिया तो
    क्या वह कुछ भी अच्छी बातपायेगा?
क्या तुम सोचते हो कि तुम परमेश्वर को छल पाओगे,
    ठीक उसी तरह जैसे तुम लोगों को छलते हो?
10 यदि तुम न्यायालय में छिपे छिपे किसी का पक्ष लोगे
    तो परमेश्वर निश्चय ही तुमको लताड़ेगा।
11 उसका भव्य तेज तुमको डरायेगा
    और तुम भयभीत हो जाओगे।
12 तुम सोचते हो कि तुम चतुराई भरी और बुद्धिमत्तापूर्ण बातें करते हो, किन्तु तुम्हारे कथन राख जैसे व्यर्थ हैं।
    तुम्हारी युक्तियाँ माटी सी दुर्बल हैं।

13 “चुप रहो और मुझको कह लेने दो।
    फिर जो भी होना है मेरे साथ हो जाने दो।
14 मैं स्वयं को संकट में डाल रहा हूँ
    और मैं स्वयं अपना जीवन अपने हाथों में ले रहा हूँ।
15 चाहे परमेश्वर मुझे मार दे।
    मुझे कुछ आशा नहीं है, तो भी मैं अपना मुकदमा उसके सामने लड़ूँगा।
16 किन्तु सम्भव है कि परमेश्वर मुझे बचा ले, क्योंकि मैं उसके सामने निडर हूँ।
    कोई भी बुरा व्यक्ति परमेश्वर से आमने सामने मिलने का साहस नहीं कर सकता।
17 उसे ध्यान से सुन जिसे मैं कहता हूँ,
    उस पर कान दे जिसकी व्याख्या मैं करता हूँ।
18 अब मैं अपना बचाव करने को तैयार हूँ।
    यह मुझे पता है कि
    मुझको निर्दोष सिद्ध किया जायेगा।
19 कोई भी व्यक्ति यह प्रमाणित नहीं कर सकता कि मैं गलत हूँ।
    यदि कोई व्यक्ति यह सिद्ध कर दे तो मैं चुप हो जाऊँगा और प्राण दे दूँगा।

20 “हे परमेश्वर, तू मुझे दो बाते दे दे,
    फिर मैं तुझ से नहीं छिपूँगा।
21 मुझे दण्ड देना और डराना छोड़ दे,
    अपने आतंको से मुझे छोड़ दे।
22 फिर तू मुझे पुकार और मैं तुझे उत्तर दूँगा,
    अथवा मुझको बोलने दे और तू मुझको उत्तर दे।
23 कितने पाप मैंने किये हैं?
    कौन सा अपराध मुझसे बन पड़ा?
    मुझे मेरे पाप और अपराध दिखा।
24 हे परमेश्वर, तू मुझसे क्यों बचता है?
    और मेरे साथ शत्रु जैसा व्यवहार क्यों करता है?
25 क्या तू मुझको डरायेगा?
    मैं (अय्यूब) एक पत्ता हूँ जिसके पवन उड़ाती है।
    एक सूखे तिनके पर तू प्रहार कर रहा है।
26 हे परमेश्वर, तू मेरे विरोध में कड़वी बात बोलता है।
    तू मुझे ऐसे पापों के लिये दु:ख देता है जो मैंने लड़कपन में किये थे।
27 मेरे पैरों में तूने काठ डाल दिया है, तू मेरे हर कदम पर आँख गड़ाये रखता है।
    मेरे कदमों की तूने सीमायें बाँध दी हैं।
28 मैं सड़ी वस्तु सा क्षीण होता जाता हूँ
    कीड़ें से खाये हुये
    कपड़े के टुकड़े जैसा।”

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