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Read the Bible from start to finish, from Genesis to Revelation.
Duration: 365 days
Hindi Bible: Easy-to-Read Version (ERV-HI)
Version
अय्यूब 5-7

“अय्यूब, यदि तू चाहे तो पुकार कर देख ले किन्तु तुझे कोई भी उत्तर नहीं देगा।
    तू किसी भी स्वर्गदूत की ओर मुड़ नहीं सकता है।
मूर्ख का क्रोध उसी को नष्ट कर देगा।
    मूर्ख की तीव्र भावनायें उसी को नष्ट कर डालेंगी।
मैंने एक मूर्ख को देखा जो सोचता था कि वह सुरक्षित है।
    किन्तु वह एकाएक मर गया।
ऐसे मूर्ख व्यक्ति की सन्तानों की कोई भी सहायता न कर सका।
    न्यायालय में उनको बचाने वाला कोई न था।
उसकी फसल को भूखे लोग खा गये, यहाँ तक कि वे भूखे लोग काँटों की झाड़ियों के बीच उगे अन्न कण को भी उठा ले गये।
    जो कुछ भी उसके पास था उसे लालची लोग उठा ले गये।
बुरा समय मिट्टी से नहीं निकलता है,
    न ही विपदा मैदानों में उगती है।
मनुष्य का जन्म दु:ख भोगने के लिये हुआ है।
    यह उतना ही सत्य है जितना सत्य है कि आग से चिंगारी ऊपर उठती है।
किन्तु अय्यूब, यदि तुम्हारी जगह मैं होता
    तो मैं परमेश्वर के पास जाकर अपना दुखड़ा कह डालता।
लोग उन अद्भुत भरी बातों को जिन्हें परमेश्वर करता है, नहीं समझते हैं।
    ऐसे उन अद्भुत कर्मो का जिसे परमेश्वर करता है, कोई अन्त नहीं है।
10 परमेश्वर धरती पर वर्षा को भेजता है,
    और वही खेतों में पानी पहुँचाया करता है।
11 परमेश्वर विनम्र लोगों को ऊपर उठाता है,
    और दु:खी जन को अति प्रसन्न बनाता है।
12 परमेश्वर चालाक व दुष्ट लोगों के कुचक्र को रोक देता है।
    इसलिये उनको सफलता नहीं मिला करती।
13 परमेश्वर चतुर को उसी की चतुराई भरी योजना में पकड़ता है।
    इसलिए उनके चतुराई भरी योजनाएं सफल नहीं होती।
14 वे चालाक लोग दिन के प्रकाश में भी ठोकरें खाते फिरते हैं।
    यहाँ तक कि दोपहर में भी वे रास्ते का अनुभव रात के जैसे करते हैं।
15 परमेश्वर दीन व्यक्ति को मृत्यु से बचाता है
    और उन्हें शक्तिशाली चतुर लोगों की शक्ति से बचाता है।
16 इसलिए दीन व्यक्ति को भरोसा है।
    परमेश्वर बुरे लोगों को नष्ट करेगा जो खरे नहीं हैं।

17 “वह मनुष्य भाग्यवान है, जिसका परमेश्वर सुधार करता है
    इसलिए जब सर्वशक्तिशाली परमेश्वर तुम्हें दण्ड दे रहा तो तुम अपना दु:खड़ा मत रोओ।
18 परमेश्वर उन घावों पर पट्टी बान्धता है जिन्हें उसने दिया है।
    वह चोट पहुँचाता है किन्तु उसके ही हाथ चंगा भी करते हैं।
19 वह तुझे छ: विपत्तियों से बचायेगा।
    हाँ! सातों विपत्तियों में तुझे कोई हानि न होगी।
20 अकाल के समय परमेश्वर
    तुझे मृत्यु से बचायेगा
और परमेश्वर युद्ध में
    तेरी मृत्यु से रक्षा करेगा।
21 जब लोग अपने कठोर शब्दों से तेरे लिये बुरी बात बोलेंगे,
    तब परमेश्वर तेरी रक्षा करेगा।
विनाश के समय
    तुझे डरने की आवश्यकता नहीं होगी।
22 विनाश और भुखमरी पर तू हँसेगा
    और तू जंगली जानवरों से कभी भयभीत न होगा।
23 तेरी वाचा परमेश्वर के साथ है यहाँ तक कि मैदानों की चट्टाने भी तेरा वाचा में भाग लेती है।
    जंगली पशु भी तेरे साथ शान्ति रखते हैं।
24 तू शान्ति से रहेगा
    क्योंकि तेरा तम्बू सुरक्षित है।
तू अपनी सम्पत्ति को सम्भालेगा
    और उसमें से कुछ भी खोया हुआ नहीं पायेगा।
25 तेरी बहुत सन्तानें होंगी और वे इतनी होंगी
    जितनी घास की पत्तियाँ पृथ्वी पर हैं।
26 तू उस पके गेहूँ जैसा होगा जो कटनी के समय तक पकता रहता है।
    हाँ, तू पूरी वृद्ध आयु तक जीवित रहेगा।

27 “अय्यूब, हमने ये बातें पढ़ी हैं और हम जानते हैं कि ये सच्ची है।
    अत: अय्यूब सुन और तू इन्हें स्वयं अपने आप जान।”

अय्यूब ने एलीपज को उत्तर देता है

फिर अय्यूब ने उत्तर देते हुए कहा,

“यदि मेरी पीड़ा को तौला जा सके
    और सभी वेदनाओं को तराजू में रख दिया जाये, तभी तुम मेरी व्यथा को समझ सकोगे।
मेरी व्यथा समुद्र की समूची रेत से भी अधिक भारी होंगी।
    इसलिये मेरे शब्द मूर्खतापूर्ण लगते हैं।
सर्वशक्तिमान परमेश्वर के बाण मुझ में बिधे हैं और
    मेरा प्राण उन बाणों के विष को पिया करता है।
    परमेश्वर के वे भयानक शस्त्र मेरे विरुद्ध एक साथ रखी हुई हैं।
तेरे शब्द कहने के लिये आसान हैं जब कुछ भी बुरा नहीं घटित हुआ है।
यहाँ तक कि बनैला गधा भी नहीं रेंकता यदि उसके पास घास खाने को रहे
    और कोई भी गाय तब तक नहीं रम्भाती जब तक उस के पास चरने के लिये चारा है।
भोजन बिना नमक के बेस्वाद होता है
    और अण्डे की सफेदी में स्वाद नहीं आता है।
इस भोजन को छूने से मैं इन्कार करता हूँ।
    इस प्रकार का भोजन मुझे तंग कर डालता है।
मेरे लिये तुम्हारे शब्द ठीक उसी प्रकार के हैं।

“काश! मुझे वह मिल पाता जो मैंने माँगा है।
    काश! परमेश्वर मुझे दे देता जिसकी मुझे कामना है।
काश! परमेश्वर मुझे कुचल डालता
    और मुझे आगे बढ़ कर मार डालता।
10 यदि वह मुझे मारता है तो एक बात का चैन मुझे रहेगा,
    अपनी अनन्त पीड़ा में भी मुझे एक बात की प्रसन्नता रहेगा कि मैंने कभी भी अपने पवित्र के आदेशों पर चलने से इन्कार नहीं किया।

11 “मेरी शक्ति क्षीण हो चुकी है अत: जीते रहने की आशा मुझे नहीं है।
    मुझ को पता नहीं कि अंत में मेरे साथ क्या होगा इसलिये धीरज धरने का मेरे पास कोई कारण नहीं है।
12 मैं चट्टान की भाँति सुदृढ़ नहीं हूँ।
    न ही मेरा शरीर काँसे से रचा गया है।
13 अब तो मुझमें इतनी भी शक्ति नहीं कि मैं स्वयं को बचा लूँ।
    क्यों? क्योंकि मुझ से सफलता छीन ली गई है।

14 “क्योंकि वह जो अपने मित्रों के प्रति निष्ठा दिखाने से इन्कार करता है।
    वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर का भी अपमान करता है।
15 किन्तु मेरे बन्धुओं, तुम विश्वासयोग्य नहीं रहे।
    मैं तुम पर निर्भर नहीं रह सकता हूँ।
तुम ऐसी जलधाराओं के सामान हो जो कभी बहती है और कभी नहीं बहती है।
    तुम ऐसी जलधाराओं के समान हो जो उफनती रहती है।
16 जब वे बर्फ से और पिघलते हुए हिम सा रूँध जाती है।
17 और जब मौसम गर्म और सूखा होता है
    तब पानी बहना बन्द हो जाता है,
    और जलधाराऐं सूख जाती हैं।
18 व्यापारियों के दल मरुभूमि में अपनी राहों से भटक जाते हैं
    और वे लुप्त हो जाते हैं।
19 तेमा के व्यापारी दल जल को खोजते रहे
    और शबा के यात्री आशा के साथ देखते रहे।
20 वे आश्वत थे कि उन्हें जल मिलेगा
    किन्तु उन्हें निराशा मिली।
21 अब तुम उन जलधाराओं के समान हो।
    तुम मेरी यातनाओं को देखते हो और भयभीत हो।
22 क्या मैंने तुमसे सहायता माँगी? नहीं।
    किन्तु तुमने मुझे अपनी सम्मति स्वतंत्रता पूर्वक दी।
23 क्या मैंने तुमसे कहा कि शत्रुओं से मुझे बचा लो
    और क्रूर व्यक्तियों से मेरी रक्षा करो।

24 “अत: अब मुझे शिक्षा दो और मैं शान्त हो जाऊँगा।
    मुझे दिखा दो कि मैंने क्या बुरा किया है।
25 सच्चे शब्द सशक्त होते हैं
    किन्तु तुम्हारे तर्क कुछ भी नहीं सिद्ध करते।
26 क्या तुम मेरी आलोचना करने की योजनाऐं बनाते हो?
    क्या तुम इससे भी अधिक निराशापूर्ण शब्द बोलोगे?
27 यहाँ तक कि तुम जुऐ में उन बच्चों की वस्तुओं को छीनना चाहते हो,
    जिनके पिता नहीं हैं।
    तुम तो अपने निज मित्र को भी बेच डालोगे।
28 किन्तु अब मेरे मुख को पढ़ो।
    मैं तुमसे झूठ नहीं बोलूँगा।
29 अत:, अपने मन को अब परिवर्तित करो।
    अन्यायी मत बनो, फिर से जरा सोचो कि मैंने कोई बुरा काम नहीं किया है।
30 मैं झूठ नहीं कह रहा हूँ। मुझको भले
    और बुरे लोगों की पहचान है।”

अय्यूब ने कहा,

“मनुष्य को धरती पर कठिन संघर्ष करना पड़ता है।
    उसका जीवन भाड़े के श्रमिक के जीवन जैसा होता है।
मनुष्य उस भाड़े के श्रमिक जैसा है जो तपते हुए दिन में मेहनत करने के बाद शीतल छाया चाहता है
    और मजदूरी मिलने के दिन की बाट जोहता रहता है।
महीने दर महीने बेचैनी के गुजर गये हैं
    और पीड़ा भरी रात दर रात मुझे दे दी गई है।
जब मैं लेटता हूँ, मैं सोचा करता हूँ कि
    अभी और कितनी देर है मेरे उठने का?
यह रात घसीटती चली जा रही है।
    मैं छटपटाता और करवट बदलता हूँ, जब तक सूरज नहीं निकल आता।
मेरा शरीर कीड़ों और धूल से ढका हुआ है।
    मेरी त्वचा चिटक गई है और इसमें रिसते हुए फोड़े भर गये हैं।

“मेरे दिन जुलाहे की फिरकी से भी अधिक तीव्र गति से बीत रहें हैं।
    मेरे जीवन का अन्त बिना किसी आशा के हो रहा है।
हे परमेश्वर, याद रख, मेरा जीवन एक फूँक मात्र है।
    अब मेरी आँखें कुछ भी अच्छा नहीं देखेंगी।
अभी तू मुझको देख रहा है किन्तु फिर तू मुझको नहीं देख पायेगा।
    तू मुझको ढूँढेगा किन्तु तब तक मैं जा चुका होऊँगा।
एक बादल छुप जाता है और लुप्त हो जाता है।
    इसी प्रकार एक व्यक्ति जो मर जाता है और कब्र में गाड़ दिया जाता है, वह फिर वापस नहीं आता है।
10 वह अपने पुराने घर को वापस कभी भी नहीं लौटेगा।
    उसका घर उसको फिर कभी भी नहीं जानेगा।

11 “अत: मैं चुप नहीं रहूँगा। मैं सब कह डालूँगा।
    मेरी आत्मा दु:खित है और मेरा मन कटुता से भरा है,
    अत: मैं अपना दुखड़ा रोऊँगा।
12 हे परमेश्वर, तू मेरी रखवाली क्यों करता है?
    क्या मैं समुद्र हूँ, अथवा समुद्र का कोई दैत्य?
13 जब मुझ को लगता है कि मेरी खाट मुझे शान्ति देगी
    और मेरा पलंग मुझे विश्राम व चैन देगा।
14 हे परमेश्वर, तभी तू मुझे स्वप्न में डराता है,
    और तू दर्शन से मुझे घबरा देता है।
15 इसलिए जीवित रहने से अच्छा
    मुझे मर जाना ज्यादा पसन्द है।
16 मैं अपने जीवन से घृणा करता हूँ।
    मेरी आशा टूट चुकी है।
मैं सदैव जीवित रहना नहीं चाहता।
    मुझे अकेला छोड़ दे। मेरा जीवन व्यर्थ है।
17 हे परमेश्वर, मनुष्य तेरे लिये क्यों इतना महत्वपूर्ण है?
    क्यों तुझे उसका आदर करना चाहिये? क्यों मनुष्य पर तुझे इतना ध्यान देना चाहिये?
18 हर प्रात: क्यों तू मनुष्य के पास आता है
    और हर क्षण तू क्यों उसे परखा करता है?
19 हे परमेश्वर, तू मुझसे कभी भी दृष्टि नहीं फेरता है
    और मुझे एक क्षण के लिये भी अकेला नहीं छोड़ता है।
20 हे परमेश्वर, तू लोगों पर दृष्टि रखता है।
    यदि मैंने पाप किया, तब मैं क्या कर सकता हूँ
तूने मुझको क्यों निशाना बनाया है?
    क्या मैं तेरे लिये कोई समस्या बना हूँ?
21 क्यों तू मेरी गलतियों को क्षमा नहीं करता और मेरे पापों को
    क्यों तू माफ नहीं करता है?
मैं शीघ्र ही मर जाऊँगा और कब्र में चला जाऊँगा।
    जब तू मुझे ढूँढेगा किन्तु तब तक मैं जा चुका होऊँगा।”

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