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10 येशु के शिष्यों ने उनके पास आ कर उनसे प्रश्न किया, “गुरुवर, आप लोगों को दृष्टान्तों में ही शिक्षा क्यों देते हैं?” 11 उसके उत्तर में येशु ने कहा, “स्वर्ग-राज्य के रहस्य जानने की क्षमता तुम्हें तो प्रदान की गई है, उन्हें नहीं. 12 क्योंकि जिस किसी के पास है उसे और अधिक प्रदान किया जाएगा और वह सम्पन्न हो जाएगा किन्तु जिसके पास नहीं है उससे वह भी ले लिया जाएगा, जो उसके पास है. 13 यही कारण है कि मैं लोगों को दृष्टान्तों में शिक्षा देता हूँ:

“क्योंकि वे देखते हुए भी कुछ नहीं देखते तथा
    सुनते हुए भी कुछ नहीं सुनते और
न उन्हें इसका अर्थ ही समझ आता है.

14 उनकी इसी स्थिति के विषय में भविष्यद्वक्ता यशायाह की यह भविष्यवाणी पूरी हो रही है:

“‘तुम सुनते तो रहोगे किन्तु समझोगे नहीं;
    तुम देखते तो रहोगे किन्तु तुम्हें कोई ज्ञान न होगा;
15 क्योंकि इन लोगों का मन-मस्तिष्क मन्द पड़ चुका है.
    वे अपने कानों से ऊँचा ही सुना करते हैं. उन्होंने अपनी आँखें मूंद रखी हैं
    कि कहीं वे अपनी आँखों से देखने न लगें,
    कानों से सुनने न लगें तथा
अपने हृदय से समझने न लगें और मेरी ओर फिर जाएँ कि मैं उन्हें स्वस्थ कर दूँ.’

16 धन्य हैं तुम्हारी आँखें क्योंकि वे देखती हैं और तुम्हारे कान क्योंकि वे सुनते हैं. 17 मैं तुम पर एक सच प्रकट कर रहा हूँ: अनेक भविष्यद्वक्ता और धर्मी व्यक्ति वह देखने की कामना करते रहे, जो तुम देख रहे हो किन्तु वे देख न सके तथा वे वह सुनने की कामना करते रहे, जो तुम सुन रहे हो किन्तु सुन न सके.

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